लोकतंत्र की रक्षा का ढोंग रच रहे भूपेश
संवैधानिक प्रजातंत्र व कांग्रेसी प्रजातंत्र में बड़ा अंतर दिखा गए भूपेश
बीते दिन आशा अनुरूप मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का भाजपा के हल्ला बोल आंदोलन पर बयान आया। जिसका पूरा मीडिया, भाजपा कार्यकर्ता व आम जनमानस प्रतीक्षा कर रहा था। बयान में उन्होंने भाजपाइयों पर पुलिस कर्मियों को उकसाने का आरोप लगाते हुए उनसे अभ्रदता व मारपीट की बात कह हुड़दंगियों की संज्ञा दी। वे इतने में नहीं रूके उन्होंने भाजपाईयों को लोकतंत्र के विघटक बताते हुए खुद को प्रजातंत्र का बड़ा रक्षक बताया वहीं सभी कांग्रेसियों को लोकतंत्र प्रहरी की आश्चर्य चकित कर देने वाली तमगे से नवाजा। बकायदा इसके लिए उन्होनें अपने विपक्ष अर्थात कांग्रेस प्रदेश अध्यक्षीय का दौर याद दिलाया। साथ ही अपने साथ हुए कुछ राजनीतिक घटनाक्रमों का बखान किया। लेकिन वे ये सब कहते हुए यह भूल गए कि बीते दिन ही राजनांदगांव में निगम सामान्य सभा में उनके ही पार्टी कांग्रेस का लोकतंत्र प्रहरी (पार्षद) एक विपक्षी दल के अन्य जनप्रतिनिधि को सभा में तर्क-विर्तक के दौरान थप्पड़ जड़ देता है। इतना ही नहीं अभ्रद शब्दों का अद्भूत प्रयोग कर सभा में शामिल महिला जन प्रतिनिधियों को शर्मसार होने और मजबूरन सभा छोड़ने पर मजबूर कर देता है। शायद ऐसे कांग्रेसी जनप्रतिनिधि माननीय मुख्यमंत्री के नजरों में लोकतंत्र के प्रहरी हैं। क्या यही लोकतंत्र की रक्षा है ? प्रजातंत्र में आरोप-प्रत्यारोप के दौरान विपक्ष के नेताओं को हंटरवाली और जाम वाला कहना शायद कांग्रेस लोकतंत्र में सुचिता है लेकिन वो संवैधानिक प्रजातंत्र में अशोभनीयता। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के मंत्रीमंडल में शामील एक नेता के तो बोल ही कांग्रेसी लोकतंत्र को उजागर कर देते हैं। जिसकी अभद्रता सामान्य जीवन में आम जनमानस को झकझोर देती है। इसलिए मेरा मानना है माननीय भूपेश बघेल जी संवैधानिक लोकतंत्र को स्वीकारते हुए प्रदर्शन को प्रजातांत्रिक गहना मान उनका अनुसरण निष्पक्षता के साथ करें। क्योंकि आप कांग्रेसियों की निष्पक्षता को तो हम छत्तीसगढ़वासी देख ही रहे हैं।


