संदीप निषाद की कलम से सिनेमा के संगवारी
पुष्पा: द रूल एक ऐसा सिनेमाई अनुभव है जो दर्शकों को शुरुआत से अंत तक बांधे रखता है। इस बार पुष्पा का रुतबा सिर्फ चित्तूर तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सात समुंदर पार तक फैल चुका है। फिल्म में एक बड़ा ट्विस्ट तब आता है जब मौजूदा मुख्यमंत्री पुष्पा के साथ फोटो खिंचवाने से मना कर देता है। इस अपमान के बाद पुष्पा की चालों का सिलसिला शुरू होता है और वह न केवल मुख्यमंत्री को सत्ता से हटाता है, बल्कि अपने वफादार नेता को मुख्यमंत्री बना देता है। इसी घटना से फिल्म में एक नया मोड़ आता है और कहानी रोमांचक हो जाती है।
इस बार पुष्पा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लाल चंदन की तस्करी कर रहा है, जिससे उसकी ताकत और साम्राज्य लगातार बढ़ता जा रहा है। लेकिन हर बड़ी ताकत के साथ उतने ही बड़े दुश्मन भी आते हैं। एसपी शेखवत (फहद फासिल) पुष्पा को रोकने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक देता है। उसकी चालें और पुष्पा की जवाबी कार्रवाई दर्शकों को हर पल उत्सुक बनाए रखती हैं। सिंडिकेट के मेंबर्स के खिलाफ शेखवत के कदम और पुष्पा के साम्राज्य को खत्म करने की उसकी कोशिशें फिल्म को और दिलचस्प बनाती हैं।
फिल्म के कई दृश्य अपने आप में यादगार हैं। जत्रा के दौरान देवी के रूप में पुष्पा का डांस और गुंडों की धुलाई वाला सीन अल्लू अर्जुन की अदाकारी का शानदार उदाहरण है। नदी के रास्ते ट्रकों का पीछा हो या हेलिकॉप्टर से सोफा ले जाने का सीन, हर फ्रेम सुपर से ऊपर होते जाता है । फिल्म का क्लाइमेक्स फाइट बेहद धमाकेदार है, जिसमें पुष्पा और उसके दुश्मनों के बीच का टकराव दर्शकों को सीट से उठने नहीं देता।
अभिनय की बात करें तो अल्लू अर्जुन ने पुष्पा के किरदार में जान डाल दी है। उनका दमदार डायलॉग डिलीवरी और करिश्माई स्क्रीन प्रेजेंस इस फिल्म की सबसे बड़ी ताकत है। इस बार रश्मिका मंदाना का किरदार और स्क्रीन टाइम पहले से ज्यादा है, जिससे श्रीवल्ली और पुष्पा के रिश्ते की गहराई बेहतर तरीके से उभरकर सामने आई है। वहीं, फहद फासिल का एसपी शेखवत के रूप में प्रदर्शन लाजवाब है। वह हर बार स्क्रीन पर आते ही अपनी छाप छोड़ते हैं और दर्शकों को खौफ और हास्य का अनूठा मिश्रण पेश करते हैं।
लोकेशंस और वीएफएक्स का काम बेहतरीन है। बैकग्राउंड म्यूजिक किरदार और कहानी को और मजबूत बनाते हैं। लाल चंदन के जंगल, नदी के सीन और एक्शन दृश्यों को बेहद प्रभावशाली ढंग से फिल्माया गया है।
फिल्म की लंबाई 3 घंटे 23 मिनट है, लेकिन इतनी दिलचस्प है कि समय का एहसास ही नहीं होता। अंत में निर्देशक सुकुमार ने पुष्पा 3 की झलक देकर दर्शकों को एक और धमाकेदार अध्याय के लिए तैयार कर दिया है। कुल मिलाकर, पुष्पा: द रूल एक बेहतरीन सीक्वल है, जो पहले भाग से भी ज्यादा दमदार और मनोरंजक है। यह फिल्म पूरी तरह से पैसा वसूल है और इसे मिस करना किसी सिनेमा प्रेमी के लिए बड़ा नुकसान होगा।
संदीप निषाद


