जब पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने कहा- मुझे बधाई न दें, ये मेरा नव वर्ष नहीं है।
मुझे बधाई न दें, ये मेरा नव वर्ष नहीं है।
आज भले ही भारत में पाश्चात्य संस्कृति के वाहक होकर कई लोग पाश्चात्य नववर्ष को मनाने वाले है पर एक महापुरुष थे जिन्होंने पाश्चात्य विचारधारा और अंग्रेज़ी नववर्ष को अस्वीकार कर बधाई देने से मना कर दिया ,वे महापुरुष थे पंडित दीनदयाल उपाध्याय ।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय छात्र जीवन में सन १९३७ को सनातन धर्म महाविद्यालय में वहाँ अंग्रेज़ी के शिक्षक ने जब कक्षा के सभी छात्रों को १ जनवरी को अंग्रेज़ी नववर्ष की बधाई दी ।पंडित दीनदयाल उपाध्याय जानते थे कि शिक्षक पर पाश्चात्य संस्कृति का बहुत प्रभाव है। पंडित जी ने पुरी कक्षा के सामने शिक्षक को ससम्मान कहा
आपके स्नेह के प्रति पुरा सम्मान है आचार्य जी , किंतु मै इस नववर्ष की बधाई नही स्वीकारूंगा क्योंकि यह मेरा नव वर्ष नहीं।’ यह सुन सभी स्तब्ध हो गए। पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने आगे कहा कि मेरी सस्कृति के नववर्ष पर तो प्रकृति भी ख़ुशी से झूम उठती है और वह गुढी पाडवा को आता है। उपाध्याय जी के तथ्यपूर्ण कथन का शिक्षक पर इतना प्रभाव पड़ा कि बाद में उन्होंने स्वयं भी कभी अंग्रेजी नववर्ष नही मनाया।बैद्धिक विभाग के पेज से साभार ।


