छः केले के मामूली दाम ने प्रदर्शन की विराटता को किया प्रदर्शित
हल्ला बोल आंदोलन को लेकर एक चर्चा का दौर चल पड़ा है। मेरी सोच से पहली चर्चा का अधिकारी जिसके खिलाफ किया गया है वो राजनीतिक दल कांग्रेस है। इसलिए प्रथम अधिकार चर्चा का उनका है। दूसरा जिसने किया है अर्थात भाजपा रखता है। जबकि तीसरा जो सबसे महत्वपूर्ण है आम जनमानस जिसके लिए यह आंदोलन किया गया है। हम शुरुआत करते हैं कांग्रेस से जिसने बकायदा प्रेस कांफेस लेकर बताया कि भाजपा ने अपने हल्ला बोल प्रदर्शन में एक लाख लोगों को लाने की बात कही थी लेकिन 20 हजार से अधिक नहीं थे। कांग्रेसियों ने सीधे तौर पर भाजपा के इस आंदोलन का विफल बता अपनी राजनीतिक जवाब दर्ज की है। जबकि दूसरी और भाजपाईयों ने गदगद हो आंदोलन को ऐतिहासिक व कांग्रेस सरकार की उलटी गिनती वाला सफल प्रदर्शन बताते हुए अपने कंधो को ठोकने का काम किया है। अब इस बीच आमजनमानस ही इस आंदोलन की सत्यता को लेकर अपने विचार रख सकता है। लेकिन उन बेचारों के पास समय ही कहॉ है कि वो अपने विचार किसी अभियान पर रख सके वे तो अपनी रोजमर्रा की जिंदगी और उसे सुधारने और बिगाड़ने की जद्दोजहद में लगा हुआ है। जो आम कथित जागरूक मानस अखबार में एक पन्ने को पढ़ दूसरे पन्ने को पलटाने तक का समय नहीं रख पाता वो इस राजनीतिक हथकण्डे को अपना कीमती समय कैसे दे सकता है। ये तो रही सभी अधिकारियों की बात जिनके अपने अपने विचार हैं, अब इस पर मेरे भी आचार अर्थात विचार है जो एक भाजपा कार्यकर्ता के रूप में नहीं बल्कि प्रदर्शन में शामिल होकर उसकी समाप्ति के बाद पैदल 5 किमी की दूरी पर वापस लौटते वक्त भूखे और प्यासे के रूप में की है। मैं प्रदर्शन की समाप्ति पश्चात अपने दो अन्य साथियों के साथ लौट रहा हूॅ कि इतने में शास्त्री मार्केट के पास एक फल का दुकान लगाए महिला के पास अच्छे केले देखकर हम सभी साथियों ने अपनी भूख रूपी तृष्णा को मिटाने का प्रयास किया। मेरे मित्र ने मात्र आधा दर्जन केले का भाव पूछकर उसे खरीदा इतने में एक अन्य साथी ने हमारी छत्तीसगढ़ी बोली में मजाक के लहजे से पुरौनी की मांग की। जिस पर उक्त केले बेच रही महिला ने तपाक से कहा कि ईहां कोई पुरौनी नहीं चले। ये सब तुंहर गांव में चलत होही। मेरे मित्र ने कहा तुंहर गांव हमन इंहे के हरन ओ दाई, दाई ने कहा कौन गांव ले आए हो अऊ कतका में आए हो। मैनें पूछा का कहना चाहत हस हो दाई वो बोली मै बोलत हव आज नारा लगाए बर आए हव त कतका देके बुलाए है नेता मन काबर कि मनखे मन ल नेता मन पैसा देथे अऊ वो मन नारा लगाथे। अब हमने पूछा ऐसने काबर बोलत हस दाई….. तो वो तपाक से बोली काबर कि आज मोर पूरा केला तोर असन आने आने गांव से आए है ते मन खरीद डरे है।

वो मन भी पुरौनी मांगे फेर मैं वो मन ल नहीं देव त तु मन ल काबर दुहु। पूरा शहर म आज तुहीमन हेबव। इतना सुन हम आगे बढ़ गए लेकिन एक भाजपाई प्रदर्शनकारी के तौर पर नहीं बल्कि एक भूखे – प्यासे राहगीर के तौर पर बता सकता हूॅ कि पूरे प्रदेश से अच्छी संख्या में युवा तुर्क राजधानी आए थे जिन्हें जगह – जगह प्रशासन द्वारा बेरिकेड लगाकर कार्यक्रम स्थल में आने से रोक दिया गया था। जो पूरे नगर में हजारों की संख्या में पहुंचकर गुच्छों में टुकड़ों में घूमते हुए भूपेश सरकार के खिलाफ नारेबाजी कर रहे थे। भगवा गमछा आ ऊ झंडा लेके कार्यक्रम स्थल आने का प्रयास कर रहे थे। इसीलिए कह सकता हू केले बेचने वाली दाई ने कुछ कम शब्दों में ही सही लेकिन बहुत कुछ कह दिया था। अब मुझे और कांग्रेसियों को इस बात पर बहस नहीं करना चाहिए कि आंदोलन में भीड़ कितनी थी वो तो केले वाली दाई ने अप्रत्यक्ष ही सही लेकिन सटिक बता दिया। सटीकता के आधार पर कहता हूं आंदोलन सफल रहा है..

